औद्योगिक कचरे से जहरीली हुई साबरमती

गुजरात: साबरमती नदी में बह रहा 'जहर', किसान इसी से कर रहे खेती


अहमदाबाद। ''साबरमती नदी में मिल रहे लाल केमिकल से हमारे खेत जल रहे हैं। इससे खेती करना हमारी मजबूरी है क्‍योंकि हमारे पास पानी के साधन के तौर पर नदी ही है। इस केमिकल वाले पानी से हमें चमड़ी के रोग हो जाते हैं, इससे उगाए गए अनाज से हमें नुकसान पहुंचता ही होगा, लेकिन हम कर ही क्‍या सकते हैं।''


यह बात अहमदाबाद के ग्यारसपुर गांव के रहने वाले किसान अमृत (42 साल) बताते हैं। अमृत जैसे कई किसान साबरमती नदी के पानी से ही खेती कर रहे हैं। अहमदाबाद के बाद करीब 120 किलोमीटर दूर तक साबरमती नदी बहती है, जिसके पानी से किसान खेती करते हैं। य‍ह किसान सब्‍जी से लेकर अपने पशुओं के लिए चारा तक उगाते हैं, लेकिन अब नदी के पानी से ही इनकी परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। नदी के पानी से बहुत जगह खेती की जाती है, फिर साबरमती के पानी से खेती करना इतना खतरनाक क्‍यों है? इस बारे में गुजरात लोक समिति की सदस्‍य मुदिता विद्रोही बताती हैं, ''साबरमती नदी राजस्‍थान से बहते हुए गुजरात में आती है। यह नदी साल के 12 महीने नहीं बहती, बल्‍कि बरसात में बहा करती है, ऐसे में यह सूखी ही रहती है। अहमदाबाद में साबरमती नदी में कई बड़े नाले गिरते हैं, जिसमें टेक्‍सटाइल और साड़ी इंडस्‍ट्री का लाल और काला पानी भी शामिल है। यह बहुत खतरनाक है। किसान अमृत (हरी टीशर्ट) पंपसेट से नदी का पानी खींचने की तैयारी कर रहे हैं। मुदिता विद्रोही कहती हैं, ''जब नदी सूखी हुई है तो अहमदाबाद में गिरने वाला लाल और काला पानी ही आगे 120 किलोमीटर तक नदी में बहते हुए अरब सागर में मिल जाता है। यानी नदी में नदी का पानी न होकर इंडस्‍ट्री और सीवेज का पानी बह रहा है। और लोग इसी केमिकल और सीवेज को साबरमती नदी का पानी मान रहे हैं।'' पर्यावरण सुरक्षा समिति ने साबरमती में गिरने वाले इंडस्‍ट्री के लाल केमिकल और सीवेज ट्रिटमेंट प्‍लांट (एसटीपी) से गिरने वाले पानी को लेकर इस साल मार्च में एक रिसर्च की है। इस रिसर्च का नाम है - 'Disastrous Condition of the Sabarmati River'. इस रिसर्च टीम में चार सदस्‍य थे, जिसमें से एक मुदिता विद्रोही भी थीं।पर्यावरण सुरक्षा समिति की इस रिपोर्ट में सामने आया कि अहमदाबाद के वासणा बैराज के आगे बने सीवेज ट्र‍िटमेंट प्‍लांट जिसकी क्षमता 160 MLD है उसमें से गिरने वाले पानी में बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 139 mg/l है। केमिकल ऑक्‍सीजन डिमांड (सीओडी) 337 mg/l है। टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 732 mg/l है। सल्‍फेट की मात्रा 108 mg/l है, वहीं क्‍लोराइड की मात्रा 186 mg/l है। यह तब है जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के अनुसार ट्रीट किए हुए पानी में बायो ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 10 mg/l तक होनी चाहिए। इसी तरह वासणा बैराज के आगे नदी में इंडस्‍ट्री के गिरने वाले पानी की जांच गई तो सामने आया कि इसमें बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 536 mg/l है। केमिकल ऑक्‍सीजन डिमांड (सीओडी) की मात्रा 1301 mg/l है। टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 3135 mg/l है। सल्‍फेट की मात्रा 933 mg/l है, वहीं क्‍लोराइड की मात्रा 933 mg/l है। खास बात है कि इंडस्‍ट्री का केमिकल युक्‍त कितना पानी रोजाना साबरमती में गिर रहा है इसका कोई लेखा जोखा नहीं है। मुदिता विद्रोही बताती हैं, ''अहमदाबाद में साबरमती नदी पर रिवरफ्रंट बनाया गया है। अब रिवरफ्रंट में पानी रहेगा तभी वो सुंदर दिख सकता है, लेकिन साबरमती में तो पानी है नहीं। ऐसे रिवरफ्रंट को नर्मदा नदी से कैनाल के द्वारा पानी लाकर भरा जा रहा है। रिवरफ्रंट जहां खत्‍म होता है वहां वासणा बैराज है, जिसके सभी फाटक बंद करके पानी को रोका गया है। ऐसे में रिवरफ्रंट के आगे नदी में पानी नहीं है और न उसके बाद नदी में पानी है। वासणा बैराज के बाद नदी में जो भी बह रहा है वो इंडस्‍ट्री और नाले का कचरा है। हमारी रिपोर्ट में भी सामने आया है कि नदी में गिर रहा कचरा बेहद खतरनाक है और इस पानी का उपयोग करने वाले लोगों के लिए यह नुकसान ही करेगा।'' शास्‍त्री पुल के नीचे नदी में गिर रहा नाला। रिपोर्ट में कहा गया है, 'अहमदाबाद में साबरमती नदी में अब ताजा पानी नहीं बचा है। साबरमती रिवरफ्रंट केवल प्रदूषित पानी का एक पूल बनकर रहा गया है। वहीं, जहां से रिवरफ्रंट खत्‍म होता है (वासणा बैराज) उसके बाद नदी में नरोडा, ओधव वाटवा और नारोल के इंडस्‍ट्री का कचरा और शहर का सीवर बह रहा है।' वासणा बैराज के आगे से ही ग्‍यासपुर गांव की शुरुआत होती है। बैराज के पास ही एक बच्‍चा जिसका नाम चिराग (12 साल) है वो अपनी भैंसों को नदी के पानी में नहलाने लाया है। वो बताता है, ''कल रात को ही बैराज के पाटिए (फाटक) खुले हैं तो थोड़ा पानी आया है। इसी लिए आज भैंसों को लेकर आया हूं। वैसे यहां सूखा ही पड़ा रहता है।'' मुदिता विद्रोही भी इसी बात को सबसे भयानक बताती हैं। वो कहती हैं, ''नदी हमेशा सूखी रहती है, वासणा बैराज से रिवरफ्रंट का पानी रोका गया है। ऐसे में आगे तो नदी है ही नहीं। अब वहां इंडस्‍ट्री का कचरा (लाल और काला पानी) और सीवेज गिर रहा है, जो सीधे बह रहा है। अब इसके असर को कम करने के लिए नदी में पानी भी नहीं है। ऐसे में यह केमिकल घुल नहीं पा रहा और नदी में बहते हुए जा रहा है और लोग इसी केमिकल का इस्‍तेमाल कर रहे हैं।'' जिस जगह इंडस्‍ट्री और सीवेज का पानी साबरमती नदी में मिल रहा है, उससे थोड़ी ही दूर पर गोविंद भाई का भी खेत है। गोविंद भाई भी साबरमती नदी के पानी को ही खेती के लिए इस्‍तेमाल करते हैं, यह बात जानते हुए कि नदी में जहर गिर रहा है। गोविंद कहते हैं, ''हम मजबूर हैं, क्‍योंकि खेती करनी है। हमारे पास पानी की और कोई व्‍यवस्‍था नहीं। इससे ही खेती करनी है। पशुओं के चारे के लिए बाजरा उगा रहा हूं, लेकिन यह उनके लिए सही नहीं इस बात को जानता हूं। हम जानते हैं कि जहर बह रहा है नदी में, पर किया क्‍या जाए?'' नदी के गंदे पानी की वजह से खेतों में काले रंग की परत जम गई है। इस पानी से सिर्फ नदी के किनारे ही खेती नहीं हो रही। नदी से दूर के खेतों तक भी यह पानी पंपसेट से खींचकर नालियों के माध्‍यम से पहुंचाया जाता है। गांव के अंदर तक के खेतों में इसी पानी से खेती हो रही है। गांव के ही रहने वाले रमेश भाई कहते हैं, ''गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं है। हमने कई बार इन नालों को लेकर शिकायत की है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं।'' साबरमती नदी के पानी के इस्‍तेमाल से ग्‍सासपुर के