बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए 161 साल पहले बनी थी नदी जोड़ो योजना लेकिन आज तक अमल नहीं हो पाया

 क्या कभी जुड़ पाएंगी नदियां? 161 साल पुरानी योजना पर मोदी सरकार से बड़ी उम्मीद







  • सबसे पहले एक अंग्रेज इंजीनियर ने 1858 में भारत की नदियों को जोड़ने की बात कही थी

  • केंद्रीय जलशक्ति मंत्री शेखावत के बयान के बाद फिर नदी जोड़ो योजना फिर चर्चा मे

  • .केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने हाल ही में कहा कि नदी जोड़ो परियोजना को आगे बढ़ाने के लिएदेश के सभी राज्यों को आपसी सहयोग करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार देश की 31 नदियों को आपस में जोड़ने के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही है। उनका मानना है कि सभीराज्यों ने सहयोग किया तो अगले 5 साल में नदी जोड़ो परियोजना में प्रभावी प्रगति आएगी।


नदियों को आपस में जोड़ने का विचार 161 साल पुराना है। 1858 में ब्रिटिश सैन्य इंजीनियर आर्थर थॉमस कॉटन ने बड़ी नदियों के बीच नहर जोड़ का प्रस्ताव दिया था, ताकि ईस्ट इंडिया कंपनी को बंदरगाहों की सुविधा हो सके और दक्षिण-पूर्वी प्रांतों में बार-बार पड़ने वाले सूखे से निपटा जा सके।


केंद्र सरकार ने हाल ही में कोसी-मेचीनदी को जोड़ने के लिए 4900 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की है। इसे नदियों को जोड़ने का देश का दूसरा सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बताया जा रहा है। इसके पहले मप्र में केन-बेतवा को जोड़ने का काम बड़े स्तर पर चल ही रहा है। इससे एक बार फिर नदियों जोड़ो अभियान चर्चा में आ गया है।


देश में अभी कई राज्य ऐसे हैं, जहां ज्यादा बारिश से बाढ़ आ जाती है तो कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां सूखा खत्म ही नहीं होता। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नदी जोड़ो परियोजना इस समस्या का विकल्प है।  इस मुद्दे पर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पर्यावरणविद डॉ. राजेंद्र सिंह, गांधीवादी पर्यावरणवादी और समाजिक कार्यकर्ता चंडीप्रसाद भट्‌ट, मौसम का अनुमान लगाने वाले निजी संस्था स्काइमेट के प्रधान मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत, नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर से बात कर जाना कि क्यों नदियों को आपस में जोड़ा नहीं जा सकता? और पानी के संकट से भारत कैसे उबर सकता है।


नदी जोड़ो अभियान को लेकर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि, ' देश में कहीं ज्यादा पानी होता है तो कहीं कम। ज्यादा पानी की मात्रा अधिकहै, वहां का पानी ऐसी जगह पहुंचना चाहिए जहां पानी नहीं है। हमने नर्मदा-शिप्रा को लिंक किया। कालीसिंध-पार्वती को जोड़ने का काम मैं स्वीकृत कर चुका था।मोदी जी जब गुजरात के सीएम थे, तब उन्होंने नर्मदा का पानी साबरमती में पहुंचाकर उसे प्रवाहमान बनाया था। नदी जोड़ने और पानी बचाने का कामआज की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। अटल सरकार ने इसकी परिकल्पना की थी। हमने मध्यप्रदेश में नर्मदा से शिप्रा को जोड़कर इसकी शुरुआत की थी और कई अन्य नदियों के लिए तैयारी की थी।'


क्या है नदी जोड़ो परियोजना



  • नदियों को आपस में जोड़ने का विचार 161 साल पुराना है। सरकार नदी जोड़ परियोजना (आइएलआर) में 30 नदियों को आपस में जोड़ना चाहती है। इसके लिए 15,000 किमी लंबी नई नहरें खोदनी होंगी। जिसमें 174 घन किमी पानी स्टोर किया जा सकेगा। राष्ट्रीय नदी जोड़ो प्रोजेक्ट में कुल 30 लिंक बनाने की योजना है, जिनसे 37 नदियां जुड़ी होंगी। 

  • इसके लिए 3 हजार स्टोरेज डेम का नेटवर्क बनाने की योजना है। यह दो भागों में होगा। एक हिस्सा हिमालयी नदियों के विकास का होगा। इसमें 14 लिंक चुने गए हैं। इसी के तहत गंगा और ब्रह्मपुत्र पर जलाशय बनाने की योजना है। दूसरा भाग प्रायद्वीप नदियों के विकास का है।

  • यह दक्षिण जल ग्रिड है। इसके तहत 16 लिंक की योजना है, जो दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ती हैं। इसके तहत महानदी और गोदावरी को कृष्णा, पेन्नार, कावेरी और वैगाई नदी को जोड़ने की परिकल्पना है।


यूपीए में तवज्जो नहीं मिली, मोदी के आने के बाद फिर आई तेजी



  • यूपीए-1 और यूपीए-2 ने पूरे एक नदी जोड़ परियोजना (आइएलआर) को तवज्जो नहीं दी। यूपीए में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने इस परियोजना को विनाशक बताया था।

  • वहीं सरकार में आने के पहले ही नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2014 में बिहार में आयोजित एक चुनावी रैली के बाद ट्वीट कर कहा था कि 'नदियों को जोड़ने का अटलजी का सपना ही हमारा भी सपना है। हमारे मेहनती किसानों को यह ताकत दे सकता है'। 



  • फरवरी 2012 में आए फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाड़िया और स्वतंत्र कुमार की, सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने कहा कि यह कार्यक्रम 'राष्ट्रहित में है.' उन्होंने नदियों को जोडऩे के लिए एक विशेष कमेटी बनाने का भी आदेश दिया था।

  • इसके बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने 23 सितंबर 2014 को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई मंत्रालय के तहत एक विशेष समिति का गठन किया था। अप्रैल 2015 में एक स्वतंत्र कार्यबल भी गठित किया गया। 

  • मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली परियोजना निर्माण के चरण तक पहुंच चुकी है—एक लिंक नहर, जो मध्य प्रदेश के (पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर स्थित) धौदन के पास केन नदी से सालाना 107.4 करोड़ घन मीटर पानी निकालकर यूपी में 221 किमी दक्षिण में स्थित बेतवा नदी तक पहुंचाएगी।


विशेषज्ञ बोले, नदियों को जोड़ने के बजाय अन्य छोटे विकल्प अपनाएं तो बढ़ेगा भूजल स्तर




  1. भारत में पानी पर तिहरा अधिकार, नदी के साथ छेड़छाड़ करना सही नहीं -डॉ राजेंद्र सिंह


    मशहूर पर्यावरणविद और जल पुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले डॉ राजेंद्र सिंह कहते हैं कि, नदियों को जोड़ने की बहस तो नेहरू के जमाने से चली आ रही है लेकिन यह अब तक कारगर इसलिए नहीं हुई क्योंकि यह उपयोग नहीं है। सतलज-यमुना जल विवाद का फेल हो चुका उदाहरण हमारे सामने है। इससे न पानी राजस्थान को मिला और न ही पंजाब को। कावेरी जल विवाद भी आज तक नहीं निपटा। डॉ सिंह कहते हैं कि भारत में पानी पर तिहरा अधिकार है। नदियों में बहने वाले जल पर केंद्र सरकार का हक है। राज्य में बरसने वाले जल पर राज्य सरकार का हक है और तीसरा हक नगर निगम, पंचायतों का है। इसलिए नदियों को आपस में जोड़ना लड़ाई कराने जैसा है। पानी से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों देश को बांटने की साजिश कर रही हैं। वे कहते हैं कि नदियों को आपस में जोड़ने से एक बड़ा पर्यावरणीय संकट भी पैदा हो जाएगा। यदि हम नदी के प्राकृतिह प्रवाह के साथ छेड़छाड़ करेंगे तो यह पारिस्थितिकीय आपदा को बुलाने जैसा होगा। डॉ सिंह कहते हैं कि भारत को लिंकिंग ऑफ रिवर की जगह लिंकिंग ऑफ हार्ट की जरूरत है। हमें लोगों के दिल और दिमाग को नदियों से जोड़ना होगा। बारिश में बहकर निकल जाने वाले पानी को रोकना होगा। नदियों को जोड़ना सूखा और बाढ़ से निजात नहीं दिला सकता।




  2. नदियों को जोड़ना आखिरी विकल्प होना चाहिए -चंडीप्रसाद भट्‌ट


    गांधीवादी विचारक और पर्यावरणविद चंडीप्रसाद भट्‌ट कहते हैं कि नदियों को आपस में जोड़ना आखिर विकल्प होना चाहिए क्योंकि हर नदी का एक पारिस्थितिक तंत्र होता है। ऐसे में नदी के साथ प्रयोग करना, उस पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकता है। नदियों का तंत्र करोड़ों वर्षों से है। नदियों से कई जीव-जंतु, स्थानीय लोगों का जीवन-यापन चल रहा है। इसलिए नदियों को जोड़ने से पहले उससे होने वाले आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बदलावों पर गहन अध्ययन करना चाहिए। वे कहते हैं कि नदियों को जोड़ने के बजाए गांव-शहर में छोटे-छोटे जल संग्रहण के उपाय होना चाहिए। नदी-तालाब के आसपास वनस्पति बढ़ाना चाहिए जिससे बारिश का पानी ठहरे और तबाही न मचा सके। वनस्पति नहीं होने से पानी ठहरता नहीं और तबाही मचाता है। इसी तरह जो पुराने जल संग्रहण के स्थान हैं, उनमें ज्यादा से ज्यादा पुनर्भरण के उपाय होना चाहिए। मानवीय गतिविधिया बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, इसे रोकना बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो कुछ सालों में हिमालय से बहने वाली नदियां ही खत्म हो जाएंगी। बारिश की इतनी विकराल समस्या खड़ी होगी की हाहाकार मच जाएगा।




  3. पूरी तरह से अव्यवहारिक है ये योजना - मेधा पाटकर


     


    नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर कहती हैं कि नदियों को आपस में जोड़ना पूरी तरह से अव्यवहारिक है। वे कहती हैं कि अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह मान्य हो चुका है कि हर नदी बेसिन का एक इकोसिस्टम होता है। ऐसे में यदि नदी के पानी को जबर्दस्ती कहीं मोड़ा जाएगा तो इससे उसके इकोसिस्टम पर असर होगा। मेधा पाटकर के अनुसार, अटलजी के समय ही 2002 में यह योजना 5 लाख 60 हजार करोड़ रुपए की थी। अब 2019 में इसकी लागत 10 लाख करोड़ से भी ऊपर ही आएगी। ऐसे में इसमें निजी कंपनियां निवेश करेंगी और अपना हक मांगेगी। इस तरह से नदियों पर कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। वे कहती हैं कि इस योजना का आधार ये है कि 'जहां ज्यादा पानी है, उसे उस जगह पहुंचाया जाए, जहां पानी कम है' लेकिन प्रायोगिक तौर पर ऐसा संभव नहीं है। वे कहती हैं गंगा का पानी सिर्फ 20 फीसदी मोड़ने का प्लान है तो इससे बाढ़ कैसे रुक पाएगी? नदियों को जोड़ने से कभी बाढ़ को नहीं रोका जा सकता।




  4. चार-पांच दिन का पानी अब एक दिन में गिर रहा - महेश पलावत


     


    मौसम का आकलन करने वाली निजी संस्था स्काइमेट वेदर के प्रधान मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत कहते हैं कि जंगल में शहर बस रहे हैं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा बढ़ते जा रहा है। इसका असर मौसम पर दिखने लगा है। कहीं बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है तो कहीं सूखा जैसी स्थिति होती है। पहले जितना पानी चार-पांच दिनों में गिरता था आज कल उतना पानी 24 घंटे में ही गिर जाता है इससे बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। पानी धरती में जा ही नहीं पाता। ऐसे में जरूरी है कि पानी को कहीं डायवर्ट किया जाए। नदियों को जोड़ने से जहां ज्यादा पानी होगा, उसे वहां पहुंचाया जा सकेगा जहां पानी की कमी है। वे कहते हैं कि भविष्य में मौसम और ज्यादा बिगड़ेगा, क्योंकि प्रकृति के साथ होने वाला खिलवाड़ लगातार जारी है। ऐसे में अभी जितना पानी 24 घंटे में बरसता है हो सकता है कि उतना 12-15 घंटे में ही बरस जाए। ऐसा होने पर पानी को डायवर्ट नहीं किया गया तो बाढ़ से नुकसान होना पक्का




  5. विराट योजना के कई चरण हैं, कार्यान्वयन में समय लगेगा


     


    लोकसभा में नदियों को आपस में जोड़ने के विषय पर 27 जून 2019 को जल शक्ति राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने कहा कि, नदी जोड़ो परियोजना के कार्यान्वयन में कई चरण होते हैं। किसी परियोजना के कार्यान्वयन का चरण संबंधित राज्यों के साथ सर्वसम्मति प्राप्त होने के बाद इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार होने और वैधानिक मंजूरी के बाद पूरा होगा. इस प्रकार परियोजना के कार्यान्वयन में अलग-अलग समय लगेगा।




  6. 1858 से शुरू हुई बात आज तक है जारी


     



    • भारत में नदियों को जोड़ने की योजना पर सबसे पहले बात ब्रिटिश राज के चर्चित इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने 1858 (161 साल पहले) में की थी। उन्होंने व्यापार को बढ़ाने के साथ ही आंध्रप्रदेश और ओडिशा प्रांत में सूखे से निपटने के लिए यह प्रस्ताव रखा था। 

    • 1970 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री डॉ. केएल राव ने राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने ब्रह्मपुत्र और गंगा के पानी को मध्य और दक्षिण भारत के सूखे इलाकों में मोड़ने की बात कही थी। 

    • 1980 में जल संसाधन मंत्रालय ने नेशनल परस्पेक्टिव फॉर वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट नामक रिपोर्ट पेश की। इसमें वाटर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को दो हिस्सों में बांटा गया। एक हिमालयी इलाका और दूसरा प्रायद्वीप। 

    • 1982 में नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी द्वारा विस्तृत अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की कमेटी गठित की गई।

    • 1982 से 2013 तक एनडब्लुडीए ने 30 से ज्यादा रिपोर्ट बनाईं लेकिन एक भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो सका। 

    • 1999 में एनडीए सरकार बनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नदी जोड़ो परियोजना पर काम शुरू किया। हालांकि 2004 में एनडीएन सरकार जाते ही यह योजना फिर ठंडे बस्ते में चली गई। 

    • 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि वह इस परियोजना पर समयबद्ध तरीके से अमल करे। जिससे इसकी लागत और न बढ़े। कोर्ट ने योजना पर अमल के लिए एक उच्च स्तरीय समिति भी बनाई।




  7. कौन से हैं बड़े प्रोजेक्ट्स


     



    • केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट : इसमें केन नदी पर डैम बनाने की योजना है। नहर के जरिए पानी बेतवा पहुंचाया जाएगा।

    • दमनगंगा- पिंजल प्रोजेक्ट : डीपीआर मार्च 2014 में पूरी हो चुकी। महाराष्ट्र सरकार ने 2015 में रिपोर्ट राष्ट्रीय जल आयोग को सौंप दी। 

    • पार-तापी नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट : 2015 में डीपीआर तैयार। महाराष्ट्र और गुजरात सरकार को सौंपी। 

    • महानदी-गोदावरी लिंक प्रोजेक्ट : इस पर भी काम चल रहा है। 

    • मानस-संकोश-तीस्ता-गंगा लिंक : इसके तहत मानस, संकोश के अतिरिक्त पानी को डायवर्ट करने के योजना है। 

    • इंटर-स्टेट लिंक : एनडब्लुडीए को 9 राज्यों से 46 प्रस्ताव मिले हैं। इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, ओडिशा, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटका और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। इन 46 में से 35 इंटर स्टेट लिंक की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट एनडब्लुडीए द्वारा मार्च 2015 तक तैयार कर ली गई थी।




  8. दूसरी पारी में मोदी सरकार क्या कर रही है?


     



    • मोदी सरकार ने नदी जोड़ो अभियान को अपनी प्राथमिकता में रखा है। सरकार का मकसद सूखा और बाढ़ की समस्या को खत्म करना है। साथ ही किसानों के पानी के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है ताकि वो सिर्फ मानसून पर ही निर्भर न रहें। 

    • मोदी सरकार ने इस प्रोजेक्ट का जिम्मा राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण (NWDA) को सौंपा है। प्राधिकरण की मॉनिटरिंग का जिम्मा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को सौंपा गया है। 

    • सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस परियोजना के लिए 23 सितंबर 2014 को विशेष समिति गठित की थी। अप्रैल 2015 में मंत्रालय द्वारा एक टास्क फोर्स गठित की गई