बाढ़ और अतिवृष्टि से मध्य प्रदेश में 16000 करोड़ों का नुकसान राहत देने में भी केंद्र कर रहा है राजनीति

16 हजार करोड़ का नुकसान, किसान हलाकान



राहत में राजनीति 
प्रदेश में इस बार अतिवृष्टि और बाढ़ से 40 जिले प्रभावित हुए हैं। 55 लाख किसानों की 60.52 लाख हैक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। मप्र सरकार ने नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र से 7154.28 करोड़ रुपए की सहायता राशि शीघ्र जारी करने का अनुरोध किया है। लेकिन इस पर राजनीति हो रही है। कर्नाटक और बिहार के लिए पैकेज जारी हो गया है, लेकिन मप्र के लिए नहीं। 

भोपाल । केंद्र सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण मप्र के 55 लाख से अधिक किसान हलाकान है। एक तरफ केंद्र सरकार ने बारिश और बाढ़ से बेहाल हुए कर्नाटक को 1200 करोड़ और बिहार को 400 करोड़ रुपए की तत्काल राहत दी है, वहीं मप्र को एक ढेला भी नहीं दिया है। जबकि प्रदेश में अतिवृष्टि और बाढ़ से हुई क्षति की पूर्ति के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ सहित प्रदेश के कई मंत्री प्रधानमंत्री सहित केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात कर चुके हैं, लेकिन अभी तक आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है। जबकि बारिश और बाढ़ से इस बार करीब 16 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
प्रदेश में इस बार अतिवृष्टि और बाढ़ से 40 जिले प्रभावित हुए हैं। सरकारी अनुमान के अनुसार, 55 लाख किसानों की 60.52 लाख हैक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। प्रारंभिक तौर पर मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश में अति-वर्षा और बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र सरकार से 7154.28 करोड़ रुपए की सहायता राशि शीघ्र जारी करने का अनुरोध किया है। इस राशि में एनडीआरएफ मद से 6621.28 करोड़ रुपए केंद्रीय सहायता राशि और एसडीआरएफ से इस वर्ष की दूसरी किश्त की राशि 533 करोड़ रुपए शामिल है। लेकिन एक पखवाड़े से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी केंद्र ने प्रदेश को अग्रिम राहत राशि जारी नहीं की है। गौरतलब है कि देश के अधिकांश राज्यों में भारी बरसात के कारण तबाही का मंजर पैदा हो गया है, यहां सभी जगह प्रभावित राज्यों की एक-सी समस्या है, लेकिन जिस ढंग से केंद्र सरकार उदारतापूर्वक कुछ ही राज्यों को, जो उसके या उसके सहयोगियों के साथ सत्ता में हैं उन्हें फौरी राहत प्रदान कर रही है और उसने तत्काल जिस प्रकार की मदद बिहार व कर्नाटक को की है वैसी कोई फौरी मदद अभी मध्यप्रदेश की नहीं की है।
मोदी से मिले थे मुख्यमंत्री
गौरतलब है कि 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी और फौरी तौर पर 9000 करोड़ रुपए की तत्काल सहायता देने का आग्रह किया था। लेकिन केंद्र ने एक पखवाड़े से अधिक का समय गुजर जाने के बाद भी केंद्र ने एक फूटी कौड़ी भी नहीं भेजी है। उधर, प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों ने भी केंद्र सरकार के मंत्रियों से मिलकर बाढ़ पीडि़तों के लिए राहत राशि मांगी है। लेकिन केंद्र सरकार ने फिलहाल कोई राहत राशि नहीं दी है। केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे भेदभाव पर मुख्यमंत्री कमलनाथ का कहना है कि केंद्र सरकार की नीतियां प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से राज्यों के विकास को प्रभावित कर रही हैं। केंद्र की अभी तक की भूमिका सहयोगात्मक नहीं है। राज्य सरकार बाढ़ पीडि़तों की हरसंभव मदद के लिए वचनबद्ध है। इस समय किसानों को राजनीति नहीं मदद की जरुरत है। भाजपा के नेताओं व सांसदों को चाहिए कि वे बाढ़ पीडि़तों के नाम पर राजनीति करने से बाज आएं और उन्हें राहत पहुंचाने में राज्य सरकार की मदद करें।
फसल बीमा क्लेम की प्रक्रिया शुरू
किसानों को राहत दिलाने के लिए फसल बीमा के क्लेम बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। बताया जा रहा है कि कुछ जिलों में कलेक्टरों ने प्रभावित क्षेत्रों को अधिसूचित कर दिया है तो एक लाख से ज्यादा किसान बीमा कंपनियों के कॉल सेंटर में संपर्क कर चुके हैं। राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी का कहना है कि प्रदेश की ओर से राहत पैकेज का मांग पत्र केंद्र सरकार को पहुंच जाएगा।
जान-माल की क्षति
अतिवृष्टि, बाढ़ एवं वर्षाजनित हादसों में 674 लोगों की मत्यु हुई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार बाढ़ से इस साल जितना नुकसान हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ है। प्रदेश में बाढ़ और अतिवृष्टि से 40 जिलों में 55 लाख किसानों की 60.52 लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई। साथ ही मकान, पशु एवं जानमाल का भी नुकसान हुआ है। इसकी भरवाई के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फंड (एनडीआरएफ) से 6621 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद तत्काल मुहैया कराने की मांग की है। जिसमें फसलों को हुए नुकसान के लिए 3 हजार 742 करोड़, क्षतिग्रस्त मकानों और जानमाल के नुकसान की भरपाई के लिए 579 करोड़ 96 लाख तथा आपदा राहत आदि के लिए 13 करोड़ 44 लाख रूपये की सहायता की केन्द्र से मांग गई है। प्रदेश में खरीफ की 149.35 लाख हेक्टेयर फसल में से 60.52 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ है। इससे लगभग 55.36 लाख किसान प्रभावित हुए हैं। प्रदेश की लगभग 11 हजार किलोमीटर सडक़ें क्षतिग्रस्त हुई हैं। लगभग 18 हजार 604 बिजली के खंबे और ट्रांन्सफार्मर तथा 1.2 लाख मकान भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। मुख्य सचिव मोहन्ती ने बैठक में केन्द्र की ओर से तत्काल सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध करते हुये प्रदेश की स्थिति को गंभीर आपदा के रूप में लेने का अनुरोध किया ।
60 लाख हेक्टेयर में फसल क्षति
इस मानसून में प्रदेश में खरीफ की 149.35 लाख हेक्टेयर फसल में से 60.52 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ है। इससे लगभग 55.36 लाख किसान प्रभावित हुए हैं। अत्याधिक बारिश की वजह से मूंग और उड़द तो 90 फीसदी तक नष्ट हो गई है तो सोयाबीन को भी 50 फीसदी से अधिक क्षति पहुंची है। फूल और सब्जी की फसलें भी अतिवर्षा से बुरी तरह से प्रभावित हुई है। लगभग 22 लाख किसानों की 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसल को नुकसान होने का अनुमान है। नष्ठ हुई फसलों से करीब दस हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। इस भरपाई के लिए किसानों को राहत की दरकार है। वहीं, लगभग तीन हजार करोड़ रुपए का कर्ज किसानों के ऊपर खरीफ फसलों का है। मौजूदा परिस्थिति में वे इसे चुकाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए मांग की गई है कि अल्पावधि ऋण को मध्यावधि में तब्दील किया जाएगा।
सडक़ों को भी जमकर नुकसान
दूसरा सबसे बड़ा नुकसान सडक़, पुल और पुलिया के क्षेत्र में हुआ है। करीब 21 हजार किलोमीटर सडक़ को मरम्मत की दरकार है। कुछ सडक़ें तो नए सिरे से बनानी होंगी। वहीं, कुछ पुल और पुलिया भी बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। इन्हें दुरुस्त करने के लिए निर्माण एजेंसियों को करीब दो हजार करोड़ रुपए चाहिए। इसी तरह मकानों की बात करें तो 4608 पूरी तरह और 50,002 मकान आंशिक तौर पर क्षतिग्रस्त हुए हैं। आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल व छात्रावास को भी नुकसान पहुंचा है। 225 लोगों का निधन बिजली गिरने और बाढ़ की वजह से हुआ तो 1432 मवेशियों की मृत्यु हुई। राज्य सरकार ने अपने स्तर से प्रभावितों को आर्थिक सहायता पहुंचाने का काम शुरू कर दिया है।
सरकारी विभागों को भी नुकसान
बारिस से स्कूल शिक्षा तथा आदिम जाति कार्य विभाग के 19 हजार 958 और महिला-बाल विकास के 17 हजार 106 भवन तथा ग्रामीण विकास की 2 हजार 923 जल प्रदाय से संबंधित 2 हजार 398 संरचनाओं को नुकसान हुआ है। इसके साथ स्वास्थ्य, जल संसाधन विभाग के भवन भी प्रभावित हुए हैं। क्षतिग्रस्त भवनों की मरम्मत के लिए 2285.88 करोड़ रूपए की आवश्यकता होगी।
किस क्षेत्र में कितने नुकसान का अनुमान
कृषि क्षेत्र
10,000 करोड़
सडक़, पुल व पुलिया
1566 करोड़
आंगनवाड़ी केंद्र
31 करोड़
स्वास्थ्य केंद्र
28 करोड़
स्कूल भवन एवं छात्रावास
17.50 करोड़
जल आपूर्ति परियोजना
22.7 करोड़
बिजली आपूर्ति अधोसंरचना
23.12 करोड़
पंचायत एवं सामुदायिक भवन
47 करोड़
सिंचाई परियोजना
31 करोड़
(नोट- आंकड़े रुपए में)
सोयाबीन उत्पादन गिरा
प्रदेश में हुई तेज और अनवरत बरसात ने सोयाबीन सहित सभी फसलों का गणित बिगाड़ दिया। तीन माह से लगभग लगातार हुई बारिश ने किसानों के खेतों से पानी सूखने ही नहीं दिया। ऐसे में सोयाबीन खेतों में ही सड़ गई। कई क्षेत्रों में फसलों का 80 प्रतिशत हिस्सा खराब हो गया। सोयाबीन की बात करें तो किसानों के हिस्से में खेती में किया गया खर्च भी आता नहीं दिख रहा है। प्रदेश में सोयाबीन की फसल पर ही किसानों की दीपावली होती है, लेकिन लगता है इस बार दीपावली की फुलझड़ी की चमक भी फीकी ही रहने वाली है। कारण, सोयाबीन की उपज में भारी कमी आई। किसानों की मानें तो लगातार बारिश ने उपज का पारा बिल्कुल नीचे ला दिया है। किसानों को हर साल के मुताबिक एक चौथाई हिस्सा भी नसीब नहीं हुआ।
प्रति बीघा एक क्विंटल
भारी बारिश से सोयाबीन की हालत खस्ता है। किसान हरिराम पाटीदार ने बताया कि दस बीघा की सोयाबीन की फसल मात्र बारह क्विंटल निकली। ऐसे में जो खर्च किया, वह भी नहीं मिला। जिस खेत में बीघा के चार पांच क्विंटल का औसत रहता है, वहां उड़द का आंकड़ा महज एक क्विंटल ही रह गया। अन्य किसानों की भी यही हालत है। अशोक पाटीदार ने बताया कि प्रति बीघा एक क्विंटल की उपज हो रही है। ऐसे में दीपावली कैसे मनाएं।
बारिश-बाढ़ ने बिगाड़ा गणित
प्रदेश के किसानों के लिए यह वर्ष एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा वाली कहावत सिद्ध हो गई। कारण यह कि इस बार भारी बारिश ने पहले ही फसलों को सड़ा दिया। प्रदेश में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं बाढ़ के कारण फसलों को नुकसान हुआ है। सोयाबीन की उपज स्तर मे भारी कमी आई है। हकाई,
जुताई, दवाई, कटाई सहित सोयाबीन जब किसान घर लाया तो सिर्फ घाटा ही मिला। छोटे किसानों की हालत तो और ज्यादा खराब है।
बाजार में भी नहीं सोयाबीन
हर वर्ष सोयाबीन की फसल अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में ही बाजार मे बिकने आ जाती है, लेकिन इस बार आधा माह बीत जाने पर भी सोयाबीन का बाजार ठंडा ही दिखाई पड़ रहा है। कारण एक तो उपज नहीं हुई। जिस किसान के पास चार ट्रॉली सोयाबीन निकलता था, वह मात्र एक ट्रॉली पर सिमटकर रह गया। ऐसे में व्यापारी भी चिंतित दिखाई दे रहे है। हालांकि मजदूर की मजदूरी और कुछ खर्च के लिए छोटे कृषक सोयाबीन बेच रहे है, लेकिन बाजार में सुस्ती ही छाई है। दूसरा कारण कई किसानों का ज्यादा बारिश की वजह से सोयाबीन की क्वालिटी बिगड़ गई। कहीं दाने दागदार हो गए तो कहीं काले पड़ गए। ऐसे में भावताव को लेकर भी गणित बिगड़ रहा है। फिलहाल ग्रामीण क्षेत्रों में सोयाबीन 2700 से 3300 के बीच बिक रहा। हालांकि, खेती में किए गए खर्च के आगे यह ऊंट के मुंह मे जीरे के समान है। किसानों की माने तो सोयाबीन के भाव मे बढ़ोतरी आए ताकि खर्च तो नसीब हो।
भावांतर के 1017 रोके
केंद्र की मोदी सरकार ने प्रदेश के साथ भेदभाव कर राज्य के लाखों किसानों के भावांतर भुगतान योजना के 1017 करोड़ रुपए रोक दिए हैं। शोभा ओझा कहती हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कमलनाथ सरकार दृढ़ता से प्रदेश की तरक्की में लगी हुई है लेकिन मोदी सरकार ने लाखों किसानों के भावांतर भुगतान योजना के 1017 करोड़ रुपए रोक दिए हैं। खरीफ 2017 के भावान्तरण के 576 करोड़ रुपए, खरीफ 2018 के 321 करोड़ रुपए और अतिरिक्ति 6 लाख मीट्रिक टन के 120 करोड़ रुपए अर्थात कुल 1017 करोड़ रुपए केन्द्र द्वारा मध्यप्रदेश को अभी तक नहीं दिए गए हैं। मध्यप्रदेश में रबी सीजन 2019-20 में समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी 73.70 लाख मीट्रिक टन की है लेकिन केंद्र सरकार ने केवल 65 लाख मीट्रिक टन की समर्थन मूल्य पर खरीदी स्वीकृत की है अर्थात 8.70 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी के लिए 1500 करोड़ रुपए केंद्र सरकार से अपेक्षित हैं। इतना ही नहीं मोदी सरकार ने मध्य प्रदेश के केन्द्रीय करों के हिस्से के 2000 करोड़ रुपए भी कम कर दिये हैं। प्रदेश को इस मद में 59,000 करोड़ रुपए प्राप्त होने थे जिसे कम करके 57,000 करोड़ रुपए कर दिया गया। इसी तरह शिक्षा के अधिकार के तहत मिलने वाली राशि में भी 500 करोड़ रुपए कम दिए हैं।
प्रदेश कांग्रेस ने भी लिखा सांसदों को पत्र
उधर, किसानों को राहत राशि दिलाने के लिए प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से मीडिया विभाग की अध्यक्ष शोभा ओझा और उपाध्यक्ष अभय दुबे ने भाजपा सांसदों को पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने सांसदों से केंद्र से अधिक से अधिक आर्थिक सहायता दिलाने का अनुरोध किया है। सांसदों से यह अनुरोध भी किया गया है कि मध्यप्रदेश की केंद्रीय योजनाओं में प्रदेश सरकार के हिस्से की तथा केंद्रीय करों में मध्यप्रदेश का जो हिस्सा है और प्रदेश की अधोसंरचना विकास का रुका हुआ पैसा तत्काल दिलावाने की पहल करें ताकि किसानों का हक उन्हें तुरन्त प्रदान किया जा सके। कुछ उदाहरण देते हुए पत्र में उल्लेख किया गया है कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पेयजल कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रदेश की लगभग 2000 योजनाओं जिसमें 14 हजार गांवों के पांच लाख परिवारों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 1196.17 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं, इस योजना में 50 प्रतिशत केंद्र सरकार का अंश 598 करोड़ रुपए केंद्र ने अब तक जारी नहीं किया है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश की सडक़ों के निर्माण व उन्नयन के लिए सेंट्रल रोड फंड 498.96 करोड़ रुपए केंद्र सरकार द्वारा अभी तक प्रदेश को जारी नहीं किए गए हैं जिसके कारण अधोसंरचना विकास प्रभावित हो रहा है। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय करों के हिस्से में 2677 करोड़ रुपए बजट प्रावधानों के हिसाब से मध्यप्रदेश को कम दिए गए हैं।
मुआवजा सुलगा रही चिंगारी…
अतिवृष्टिट और बाढ़ से खरीफ फसलों के बर्बाद होने से किसान परेशान है। उस पर राज्य सरकार से फसल बीमा का मुआवजा नहीं मिलने और केंद्र सरकार द्वारा जारी नई अफीम नीति से किसानों में आक्रोश है। प्रदेश सरकार मुआवजा देने के लिए केंद्र सरकार से राहत राशि मिलने का इंतजार कर रही है। इधर खुफिया विभाग ने रिपोर्ट दी है कि मालवा में एक बार फिर किसान आंदोलन की तैयारी चल रही है। खुफिया विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों से नाराजगी के चलते अंदर ही अंदर एक बार फिर मालवा सुलगने की राह पर है। आए दिन किसान ज्ञापन और धरना दे रहे हैं। माहौल को देखते हुए लगता है, यदि सरकारों ने किसानों के मामलों पर गंभीरता से नहीं सोचा तो मालवा में 2016 जैसे हालात बन जाएंगे। गौरतलब है की नीमच में आई बाढ़ के बाद करीब एक लाख 25 हजार हेक्टेयर में लगी सोयाबीन और करीब 32 हजार हेक्टेयर में लगी चना, उड़द और मूंग की फसल तबाह हो गई, लेकिन इन किसानों को अभी तक न तो मुआवजा मिला न ही फसल बीमा की राशि ही मिली है। साथ ही कर्ज माफी का काम अधर में लटकने से किसानों में जमकर गुस्सा है।
362 करोड़ रुपए मुआवजा बांटा जा चुका: राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने इस संबंध में केंद्र को भेजे प्रस्ताव में कहा है कि प्रदेश के लिए आपदा प्रबंधन के तहत 2019-20 के लिए 1066 करोड़ स्वीकृत हैं। इसमें से सितंबर मध्य तक 362 करोड़ रूपये की राशि अन्य प्राकृतिक आपदाओं, ओला-पाला तथा राहत वितरण में खर्च की गयी है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस बार फसल को जो नुकसान हुआ है, सिर्फ उसी आधार पर फसल बीमा की राशि तय नहीं होगी। पिछले पांच साल में वहां औसत उत्पादकता क्या रही है, इससे आकलन किया जाएगा। यदि उपज प्रति हेक्टेयर अधिक है और अब फसल पूरी तरह नष्ट होने से उत्पादन कुछ भी नहीं है तो बीमा अधिक बनेगा। वहीं, फसल पूरी तरह चौपट हो गई है पर औसत उत्पादकता कम है तो बीमा राशि कम रहेगी।
बीमा कंपनियां तत्काल देंगी 25 फीसदी राशि: प्रदेश में अतिवर्षा और बाढ़ से प्रभावित किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलवाने के लिए बीमा कंपनियों के पोर्टल पर व्यक्तिगत जानकारियां अब दर्ज की जाएंगी। जिन किसानों की फसल पूरी तरह चौपट हो गई है, उन्हें तत्काल 25 फीसदी बीमा राशि मिलेगी। इसके लिए गुरुवार को कृषि संचालक ने बीमा कंपनियों और बैंकों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करके किसानों की सूची दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। उधर, कलेक्टरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे औसत उत्पादकता के आधार पर प्रकरण बनाकर क्षेत्र अधिसूचित करें, जिससे बीमा की राशि जल्द दिलवाई जा सके। सूत्रों के मुताबिक 30 लाख से ज्यादा किसानों ने खरीफ फसलों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा करवाया है। इसमें वे किसान भी शामिल हैं, जिन्होंने बैंकों से कर्ज नहीं लिया। दरअसल, फसल बीमा में सहकारी बैंक अपने द्वारा दिए गए कर्ज को सुरक्षित करने के लिए अनिवार्य रूप से फसल बीमा कराते हैं। यही वजह है कि जब किसानों को फसल बीमा की राशि मिलती है तो उस पर पहला हक बैंकों का होता है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बीमा कंपनियों ने पोर्टल इसी सप्ताह खोला है। प्रमुख सचिव कृषि अजीत केसरी ने बताया कि बीमा पोर्टल पर प्रभावित किसानों की जानकारी दर्ज करने के लिए बैंकों के साथ बैठक हो चुकी है। प्रभावित किसानों की जानकारी बैंक पोर्टल पर दर्ज कराएंगे। जिन क्षेत्रों में फसल पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है, वहां के किसानों को बीमा कंपनी तत्काल 25 फीसदी राशि उपलब्ध कराएंगी। इसके बाद जब प्रकरण अंतिम रूप से तय होगा, तब शेष राशि का भुगतान किसान के खाते में कंपनियां करेंगी। नुकसान के आधार पर बीमा राशि तय होगी।
बारिश व बाढ़ से क्षति
674 लोगों की मृत्यु
60,47,000 हेक्टेयर क्षेत्र की 16,270 करोड़ की फसल प्रभावित
53,90,000 हेक्टेयर क्षेत्र में 33 प्रतिशत तक फसल क्षतिग्रस्त
55,372 पक्का-कच्चे मकान
4,098 पक्के मकान
55,267 आंशिक रूप से कच्चे मकान
3,649 झोपडिय़ां
3,274 पशु शेड
18 लोग शारीरिक अपंगता
तीन लोगों को गंभीर चोटें
1515 दुधारू पशु, 373 भारवाही पशु तथा 3,270 मुर्गियों की क्षति।
केंद्र और राज्य दोनों से नाराज है किसान
इस मामले में किसान नेता अर्जुन सिंह बोराना कहते हैं कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार की कर्जमाफी छलावा साबित हुई है जसके चलते कई किसान आज बैंकों में डिफाल्टर घोषित हो चले हैं। ऐसे में किसानों को बीमे तक का लाभ नहीं मिल पाया है। वहीं केंद्र सरकार की नई अफीम नीति से भी किसान खुश नहीं है। किसानों को लगता है कि दोनों ही मामलों में सरकार किसानों के हित में नहीं सोच रही है। किसानों में खासा आक्रोश है और जल्द मुआवजा, बीमा राशि और कर्जमाफी को लेकर मप्र सरकार तथा अफीम नीति पर केंद्र सरकार विचार नहीं करती है तो किसानों को आंदोलित होकर सडक़ पर आना पड़ेगा। अधूरी कर्ज माफी, मुआवजा और फसल बीमा नहीं मिलने से नाराज किसानों को नई अफीम नीति ने और अधिक आक्रोशित कर दिया है।
अब अधिकारी लगाएंगे दिल्ली दौड़
सरकारी सूत्रों का कहना है कि केंद्र द्वारा राहत राशि देने में हो रही देरी से प्रदेश सरकार अब अपने अफसरों को दिल्ली भेजने की तैयारी कर रही है। राज्य सरकार अभी तक अपने स्तर से मदद भेज रही थी, लेकिन तबाही के अनुपात में यह कम है। यही वजह है कि केंद्र से 9000 करोड़ की मदद मांगी है। सरकार की मांग पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव एसके शाही के नेतृत्व में बीते दिनों अंतर मंत्रालयीन केन्द्रीय दल ने प्रदेश के 15 जिलों का भ्रमण कर नुकसान का जायजा लिया है। केन्द्रीय दल को अवगत कराया गया कि प्रदेश में एक जून से 30 सितम्बर तक की अवधि में 1348.3 एमएम वर्षा हुई, जो सामान्य से 43 प्रतिशत अधिक है। प्रदेश के 20 जिले अतिवृष्टि से प्रभावित हैं। भारी बारिश के कारण लगभग 75 हजार लोगों को राहत शिविरों और अन्य सुरक्षित स्थानों पर लाना पड़ा और लगभग 289 राहत शिविर संचालित किए गए। सरकार ने मांग की है कि जल्द से जल्द राहतत राशि मुहैया कराया जाए।