कृषि बिल - ड्राफ्ट बनाया वीपी सरकार ने , पेश किया मोदी सरकार ने
 


कृषि बिल - ड्राफ्ट बनाया वीपी सरकार ने , पेश किया मोदी सरकार ने

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अंबरीश कुमार
उदारीकरण के नए दौर में हम पिछली सरकारों के समय के फैसले अकसर  भूल जाते हैं .ताजा उदाहरण कृषि बिल का है . केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जिन कृषि विधेयक को लेकर सांसत में फंसी है वह दरअसल विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार का विचार और ड्राफ्ट है .ठीक  उसी तरह जैसे आधार से लेकर मनरेगा तक कांग्रेस सरकार का विचार और कार्यक्रम रहा .वीपी सिंह सरकार में तो समाजवादी भी थे और कुलक किसान भी .वामपंथी भी हाथ लगाए हुए थे तो दक्षिणपंथी भी .ऐसे में अगर मूल ड्राफ्ट उनकी सरकार का उठाया गया तो उनका समर्थन करने वाली सामाजिक न्याय की ताकतों को भी तो भरोसे में लिया जा सकता था .तब इतना विवाद तो न होता .  पर दिक्कत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर विचार का खुद ही क्रेडिट लेते हैं और बताते भी नहीं कि ये विचार आया कहां से .अब लाकडाउन के दौर में वे किसानो की भलाई और मुक्त बाजार की जिस अवधारणा को सामने लाए है वह तो वीपी सिंह की सरकार ने तैयार किया था .उसी मूल प्रस्ताव को झाड पोछ कर मोदी सरकार ने नए कृषि बिल का रूप दे दिया .यह बात किसी और ने नहीं बल्कि पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने कही है .वीपी सिंह के दौर में इस ड्राफ्ट को तैयार करने वाली समिति में बहुत से सुझाव उनके थे .उन्होंने यह सोमवार को आलोक अड्डा पर हुई चर्चा में सवाल जवाब के दौरान कही .उनसे इस बारे में विस्तार से पूछा गया .


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सोमपाल शास्त्री ने कृषि बिल पर कहा , जहां तक मोदी जी की बात है तो हम सब कह रहे हैं कि विश्वास का संकट है और ऐसा क्यों है तो मोदी जी का अपना स्टाइल है. वे लोकतंत्र में बहुत ज्यादा यकीन नहीं रखते. उनका गुजरात का कार्यकाल भी इसका प्रमाण है और यहां का कार्यकाल भी इसका प्रमाण है. उनकी एक आदत है कि वे छोटी से छोटी चीज को भी इवेंट में बदल देते हैं, लालकृष्ण आडवाणी जी ने भी एकबार कहा था कि हमारे मोदी जी की जो सबसे बड़ी कला है वह यह कि वे इवेंट मैनेजर बहुत अच्छे हैं. अगर अच्छी चीजें हैं और वह इतिहास में कहीं उनकी फाइलों में भी लिखी हैं या पुरानी सिफारिशों के भी हैं समितियों या आयोग के या अर्थशास्त्रियों के उनको भी वह दिखाना चाहते हैं कि यह मेरा ही मौलिक विचार है. वे दिखाना चाहते हैं कि मौलिक चिंतन मेरा है. देश में किसी और को चिंतन करने का न अधिकार है, न तमीज है, न जानकारी है. न किसान को है, न नेता को है न अर्थशास्त्रियों को है न प्रशासकों को है और न ही किसी अनुभवी व्यक्ति को है. यह उनके स्वभाव की खामी है. उन्हें अगर आंदोलन में साजिश लगती है तो हमें उनके इस तरह के क्रियाकलाप में साजिश लगती है. हमें साजिश की गंध लगती है कि कार्पोरेट घरानों को सब कुछ सौंप दिया जाए.

उन्होंने आगे कहा ,मेरा यह आरोप है कि मोदी जी का यह मौलिक विचार नहीं है, तीनों विधेयक. इसका मेरे पास सबूत है. उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट मेरे पास है. समिति नियुक्त हुई थी 6 फरवरी, 1990 को वीपी सिंह के समय. समिति को छह महीने का समय दिया गया था अपनी संतुति प्रस्तुत करने के लिए. समिति ने 26 जुलाई, 1990 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी. चौधरी देवीलाल तब उपप्रधानमंत्री और कृषि मंत्री थे. उन सिफारिशों में यह तीनों सिफारिशें इन्हीं शब्दों में अंकित है. उनको लिखवाने में मेरा भी कुछ योगदान रहा था. हालांकि मैं उस समिति का सदस्य नहीं था. समिति में चौधरी कुंभाराम थे, एम विराग, सरदार सहायम, हरदेव सिंह सांगा, शोभनाथ ईश्वर, जीएस सैनी, डीसी मिश्र थे. ग्यारह सदस्यीय समिति थी. समिति की रिपोर्ट को वीपी सिंह के मंत्रिमंडल ने स्वीकार किया था. जब उन्हें कानूनी जामा पहनाने का समय आया तो चौधरी देवीलाल की वजह से सरकार गिर गई. तीस सालों से यह प्रतीक्षा कर रही थी, यह इसका इतिहास है. मेरे पास यह सबूत है कि यह मोदी जी का मौलिक विचार नहीं है. लेकिन मैं उनको श्रेय देना चाहता हूं कि इतने सालों के बाद फाइल में से निकाल कर उन्होंने इसे क्रियानवित किया.

एक हैं उसमें संविदा खेती, एमएसपी उपलब्ध है केवल 23 या 24 जिंसों को लेकिन सब्जी, फल, दूध, मछली, अंडा, मुर्गी, पशुपालन इस पर एमएसपी लागू नहीं है. बाजार की जो अनिश्चितता है, किसान को जो सबसे बड़ा धोखा होता है वह इन्हीं चीजों पर होता है. जहां तक एमएसपी का सवाल है तो घोषित तो किया जाता है 24 जिंसों का, लेकिन उपलब्ध हैं केवल चावल, गेंहूं को, बाजरा, मक्का कपास यह सब कम पर बिकते हैं. अगर एमएसपी प्रणाली को बाहर फेंकने की उनकी मंशा है, जो हो सकती है. उनके सलाहकार जो मैक्रो अर्थशास्त्री हैं, रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट में भी यह कहा गया है कि एमएसपी प्रणाली से अनावश्यक वित्तीय दबाव पड़ता है, सरकार को घाटा होता है तो इसे हटा दिया जाए, यह आशंका सही है. यह बिल लाभकारी हो सकता है बशर्ते कि एमएसपी को न सिर्फ बरकरार रखा जाए बल्कि उसको वैधानिक आधार दिया जाए. यानी किसान को वैधानिक आधार मिले एमएसपी पाने का.
सोमपाल शास्त्री की इस टिपण्णी के साथ यह साफ़ हो गया कि मोदी सरकार अगर कृषि बिल को लेकर किसान संगठनों के साथ राजनीतिक दलों से संवाद करने के बाद यह पहल करती तो शायद कुछ जोड़ घटाने के बाद एक बेहतर कृषि बिल सामने आता .और इसका इतना विरोध भी नहीं होता .लेकिन राजनीति में यह होता कहां है .अगर सरकार प्याज के निर्यात को लेकर किसानी की आवाज नहीं सुन पा रही है तो यही स्थिति कृषि बिल की भी हो गई है 



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